मै

मनुष्य तू अकेला है
अपना पथ बनाना है
साथ नही होता कोई
यही जग का नाता है |

Advertisements

अंतरंग

गर्मी का दिन था ,शाम का समय सूरज लगभग ढल चुका था । साइकिल तेज़ी से चलता हुआ घुमावदार ,भूलभुलैया जैसी गली में दाखिल हुआ । एक पल में सरकार ,प्रशासन ,जनता को कोसते हुए आगे बढ़ा ही था की अचानक से एक आवाज़ सुनाई पड़ी रुको रुको रुको अरे रुको तो सही । साँस फूल रही थी ,72 की जगह 82 धड़क रही थी ,पैरो में अजीब सी हलचल ,माथे पर पसीना रुक ही नहीं रहा और तो और सूरज की रौशनी किसी झरोखे से ऐसे पड़ रही थी की मानो अब तो सीधे आँख अस्पताल ही पहुंचना है । सब कुछ विलुप्त सा हो गया एक पल के लिए ।
शांत सा चेहरा ,आँखे भरी हुई ,बालो को ढीले जुड़े में बाँधा गया , लग रहा की रेगिस्तान की धुप से आयी हो ,बिलकुल चुप सी आकर खड़ी थी ।बाहर से जितनी शांत दिख रही थी अंदर से उतनी ही अशांत लग रही थी । पहली बार थर्मोडीनमिक्स (thermodynamics) वाला सिस्टम (system) और सुररौनडिंग (surrounding) समझ आया था ।